राधा – अंकल लगे रहो

By | December 22, 2016

राधा के पति की मृत्यु हुए करीब एक साल हो चुका था, उनका छोटा सा परिवार था, उनके कोई बच्चा नहीं हुआ तो उन्होने एक 10 वर्ष की एक लड़की गोद ले ली थी, उसका नाम गौरी था। वो भी अब जवानी की दहलीज पर थी अब। गौरी बड़ी मासूम सी, भोली सी लड़की थी।

मैं राधा का सारा कार्य किया करता था। मैंने दौड़ धूप करके राधा की विधवा-पैंशन लगवा दी थी। मुझे नहीं मालूम था कि राधा कब मुझसे प्यार करने लगी थी। मैं तो उसे बस उसे आदर की नजर से ही देखा करता था।

एक बार अनहोनी घटना घट गई ! जी हाँ ! मेरे लिए तो वो अनहोनी ही थी।

मैं राधा को सब्जी मण्डी से सब्जी दिलवा कर लौट रहा था तो एक अच्छे रेस्तराँ में उसने मुझे रोक दिया कि मैं उसके लिए इतना काम करता हूँ, बस एक कॉफ़ी पिला कर मुझे जाने देगी।

मैंने कुछ नहीं कहा और उस रेस्तराँ में चले आये। रेस्तराँ खाली था, पर फिर भी वो मुझे एक केबिन में ले गई। मुझे कॉफ़ी पसन्द नहीं थी तो मैंने ठण्डा मंगवा लिया। राधा ने भी मुझे देख कर ठण्डा मंगवा लिया था।

मुझे आज उसकी नजर पहली बार कुछ बदली-बदली सी नजर आई। उसकी आँखों में आज नशा सा था, मादकता सी थी। मेज के नीचे से उसका पांव मुझे बार बार स्पर्श कर रहा था। मेरा कोई विरोध ना देख कर उसने अपनी चप्पल उतार कर नंगे पैर को मेरे पांव पर रख दिया।

मैं हड़बड़ा सा गया, मुझे कुछ समझ में नहीं आया। उसके पैर की नाजुक अंगुलियाँ मेरे पैर को सहलाने लगी थी। मुझे अब समझ में आने लगा था कि वो मुझे यहाँ क्यों लाई है। उसके इस अप्रत्याशित हमले से मैं एक बार तो स्तब्ध सा रह गया था, मेरे शरीर पर चींटियाँ सी रेंगने लगी थी। मुझे सहज बनाने के लिए राधा मुझसे यहाँ-वहाँ की बातें करने लगी। पर जैसे मेरे कान सुन्न से हो गए थे। मेरे हाथ-पैर जड़वत से हो गए थे।

राधा की हरकतें बढ़ती ही जा रही थी। उसका एक पैर मेरी दोनों जांघों के बीच आ गया था। उसका हाथ मेरे हाथ की तरफ़ बढ़ रहा था। तभी मैं जैसे नीन्द से जागा। मैंने अपना खाली गिलास एक तरफ़ रखा और खड़ा हो गया। राधा के चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान तैर रही थी। मेरी चुप्पी को वो शायद मेरी सहमति समझ रही थी।

मुझे उसकी इस हरकत पर हैरानी जरूर हुई थी। पर घर पहुँच कर तो उसने हद ही कर दी। घर में मैं अपनी मोटर साईकल से सब्जी उतार कर अन्दर रखने गया तो वो मेरे पीछे पीछे चली आई और मेरी पीठ से चिपक गई।

“प्रकाश, देखो बुरा ना मानना, मैं तुम्हें चाहने लगी हूँ।” उसकी स्पष्टवादिता ने मेरे दिल को धड़का कर रख दिया।

“तुम मेरे मित्र की विधवा हो, ऐसा मत कहो !” मैंने थोड़ा परेशानी से कहा।

“बस एक बार प्रकाश, मुझे प्यार कर लो, देखो, ना मत कहना !” उसकी गुहार और मन की कशमकश को मैं समझने की कोशिश कर रहा था। उसे अब ढलती जवानी के दौर में किसी पुरुष की आवश्यकता आन पड़ी थी।

मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा था, वो मेरी कमर में हाथ डाल कर मेरे सामने आ गई। उसकी आँखों में बस प्यार था, लाल डोरे खिंचे हुए थे। उसने अपनी आँखें बन्द कर ली थी और अपना चेहरा ऊपर उठा लिया था। उसके खुले हुए होंठ जैसे मेरे होंठों का इन्तज़ार कर रहे थे।

मन से वशीभूत हो कर जाने मैं कैसे उस पर झुक गया। … और उसका अधरपान करने लग गया।

उसका हाथ नीचे मेरी पैन्ट में मेरे लण्ड को टटोलने लग गया। पर आशा के विपरीत वो तो और सिकुड़ कर डर के मारे छोटा सा हो गया था। मेरे हाथ-पैर कांपने लगे थे। उसकी उभरी जवानी जैसे मेरे सीने में छेद कर देना चाहती थी।

तभी जाने कहाँ से गौरी आ गई और ताली बजा कर हंसने लगी,”तो मम्मी, आपने मैदान मार ही लिया?”

राधा एक दम से शरमा गई और छिटक कर अलग हो गई।

“चल जा ना यहाँ से … बड़ी बेशर्म हो गई है !”

“क्या मम्मी, मैं आपको कहाँ कुछ कह रही हूँ, मैं तो जा रही हूँ … अंकल लगे रहो !” उसने मुस्करा मुझे आंख मार दी। मैं भी असंमजस की स्थिति से असहज सा हो गया था। एक बार तो मुझे लगा था कि गौरी अब बवाल मचा देगी और मुझे अपमान सहन करके जाना पड़ेगा। पर इस तरह की घटना से मैं तो और ही घबरा गया था। ये उल्टी गंगा भला कैसे बहे जा रही थी?

उसके जाते ही राधा फिर से मुझसे लिपट गई। पर मेरी हिम्मत उसे बाहों में लेने कि अब भी नहीं हो रही थी।

“देखो ऑफ़िस के बाद जरूर आना, मैं इन्तज़ार करूंगी !” राधा ने अपनी विशिष्ठ शैली से इतरा कर कहा।

“अंकल, मैं भी इन्तज़ार करूँगी !” गौरी ने झांक कर कहा। राधा मेरा हाथ पकड़े बाहर तक आई। गौरी राधा से लिपट गई।

“आखिर प्रकाश अंकल को आपने पटा ही लिया, मस्त अंकल है ना !” गौरी ने शरारत भरी हंसी से कहा।

‘अरे चुप, प्रकाश क्या सोचेगा !” राधा उसकी इस शरारत से झेंप सी गई थी।

“आप दोनों तो बहुत ही मस्त हैं, मैं शाम को जरूर आऊंगा।” मुझे हंसी आ गई थी।

वो क्या कहती है इससे मुझे भला क्या फ़रक पड़ता था। पटना तो राधा ही को था ना। मुझे अब सब कुछ जैसे आईने की तरफ़ साफ़ होता जा रहा था। राधा मुझसे चुदना चाहती थी। दिन भर ऑफ़िस में मेरे दिल में खलबली मची रही कि यह सब क्या हो रहा है। क्या सच में राधा मुझे चाहती है?

मेरी पत्नी का स्वर्गवास हुए पांच साल हो चुके थे, क्या यह नई जिन्दगी की शुरूआत है? फिर गौरी ऐसे क्यों कह रही थी ? कही वो भी तो मुझसे …… मैंने अपने सर को झटक दिया। वो भरी पूरी जवानी में विधवा नारी और कहाँ मैं पैतालीस साल का अधेड़ इन्सान … राधा जैसी सुन्दर विधवा को तो को तो कई इस उम्र के साथी मिल जायेगे[/size] शाम को मैं ऑफ़िस से चार बजे ही निकल गया और सीधे राधा के यहाँ पहुंच गया।

“अंकल आप ? आप तो पांच बजे आने वाले थे ना !” गौरी ने दरवाजा खोलते हुए कहा।

“बस, मन नहीं लगा सो जल्दी चला आया।” अपनी कमजोरी को मैंने नहीं छिपाया।

“आईए, अन्दर आईए, अब बताईए मेरी मम्मी कैसी लगी?” उसकी तिरछी नजर मुझसे सही नहीं गई। मुझे शरम सी आ गई पर गौरी को कोई फ़र्क नहीं था।

“वो तो बहुत अच्छी है।” मैंने झिझकते हुए कहा।

“और मैं?” उसने अपना सीना उभार कर अपनी पहाड़ जैसी चूचियाँ दिखाई।

“तुम तो प्यारी सी हो !” उसके उभार देख कर एक बार तो मेरा मन ललचा गया गौरी एक दम से सोफ़े में से उठ कर मेरी गोदी में बैठ गई। आह ! इतनी जवानी से लदी लड़की, मेरी गोदी में ! मेरे शरीर में बिजलियाँ दौड़ गई। उसके कोमल चूतड़ मेरी जांघों पर नर्म-नर्म से लग रहे थे। बहुत सालों के बाद मुझे अपने अन्दर जवानी की आग सुलगती हुई सी महसूस हुई।

“मुझे प्यार करो अंकल … जल्दी करो ना, वर्ना मम्मी आ जायेगी।” गौरी बहुत बेशर्मी पर उतर आई थी। मैंने जोश में भर कर उसके होंठो पर अपने होंठ रख दिए और उनका रस पीने लगा। उसने अपनी आंखें बन्द कर ली। जाने कैसे मेरे हाथ उसके उभारों पर चले गये, उसके सीने के मस्त उभार मेरी हथेलियों में दब गये।

गौरी कराह उठी … सच में उसकी मांसल छातियाँ गजब की थी। एक कम उम्र की लड़की, जिस पर जवानी नई नई आई हो, उसकी बहार के क्या कहने।

“अंकल आप बहुत अच्छे हैं !” गौरी अनन्दित होती हुई कसमसाती हुई बोली।

“गौरी, तू तो अपनी मां से भी मस्त है।” मेरे मुख से अनायास ही निकल पड़ा।

‘अंकल, नीचे से आपका वो चुभ रहा है।” मैं जानबूझ कर लण्ड को उसकी चूत पर गड़ा रहा था।

“पूरा चुभा दूँ, मजा आ जायेगा !” मैंने अपना लण्ड और घुसाते हुए कहा।

“सच अंकल, जरा निकाल कर तो दिखाओ, कैसा है?” उसने आह भरते हुए कहा।

“क्या लण्ड ?…” मैंने भी शरम अब छोड़ दी थी।

“धत्त !” मेरी भाषा से वो शरमा गई।

“चल परे हट, यह देख !”

मैंने गौरी को एक तरफ़ हटा कर अपना लण्ड पैंट में से निकाल लिया। उस दिन तो डर के मारे सिकुड़ गया था पर आज नरम नरम चूतड़ो का स्पर्श पा कर, चूत की खुशबू पा कर कैसा फ़ड़फ़ड़ाने लग गया था। बहुत समय बाद प्यासा लण्ड पैंट से बाहर आकर झूमने लगा था।